यूरोप में बढ़ता तनाव और प्रवासियों पर हमले, क्या भारतीयों का ‘यूरोपियन ड्रीम’ खतरे में है?

यूरोप में बढ़ता तनाव और प्रवासियों पर हमले, क्या भारतीयों का ‘यूरोपियन ड्रीम’ खतरे में है?

लंदन 

कभी बेहतर पढ़ाई, अच्छी नौकरी और सुरक्षित भविष्य के सपने लेकर यूरोप जाने वाले प्रवासियों के लिए अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा. ब्रिटेन, आयरलैंड, जर्मनी, नीदरलैंड और कई दूसरे यूरोपीय देशों में पिछले कुछ सालों से प्रवासियों को लेकर बहस तेज होती जा रही है. ताजा हालात ये हैं कि कहीं सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, कहीं सरकारें वीजा नियम सख्त कर रही हैं और कहीं स्थानीय लोग अपने शहरों में बढ़ती आबादी और संसाधनों पर दबाव को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। 

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यूरोप में प्रवासियों के खिलाफ यह गुस्सा क्यों बढ़ रहा है? क्या भारतीय भी इसके निशाने पर हैं? और अगर हां, तो फिर इस माहौल का भारतीय छात्रों, कामगारों और परिवारों पर क्या असर पड़ सकता है? इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना होगा। 

साल 2015 में सीरिया, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में युद्ध और अस्थिरता की वजह से लाखों लोग यूरोप की ओर बढ़े. जर्मनी समेत कई देशों ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को स्वीकार किया. उस समय इसे मानवीय कदम माना गया. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतते गए, कई देशों में लोगों को लगने लगा कि स्कूलों, अस्पतालों, मकानों और सरकारी सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है। 

बेहतर भविष्य और अच्छी नौकरी के लिए भारतीय भी बड़ी संख्या में यूरोप जाने लगे. शिक्षा से लेकर रहन-सहन, साफ हवा और परिवार के लिए बेहतर माहौल की तलाश में भारतीयों ने यूरोपीय देशों को चुना. इसी दौरान यूक्रेन युद्ध की वजह से भी लाखों लोग अन्य यूरोपीय देश पहुंचे. यहीं से प्रवास और शरणार्थियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई। 

ब्रिटेन में क्यों भड़का लोगों का गुस्सा?
ब्रिटेन में पिछले कुछ वर्षों से प्रवासी एक बड़ा मुद्दा रहा है. यहां कहावत है कि लोग इंग्लिश चैनल पार करके छोटी नावों से आते हैं और संसाधनों पर कब्जा कर लेते हैं. जंगों और स्थानीय प्रताड़ना की वजह से जब लोग ब्रिटेन पुहंचते हैं और सरकार उन्हें स्वीकार करती हैं तो उनके रहने-सहने के लिए सरकारी इंतजाम भी किए जाते हैं। 

कहा जाता है कि सरकार इन लोगों को अस्थायी रूप से होटलों में ठहराती है. कई शहरों और कस्बों में स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. उनका कहना था कि उनके इलाके में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूलों और आवास की कमी है. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर कई बार ऐसी खबरें और अफवाहें भी फैलती रही हैं, जिनसे तनाव बढ़ा. कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन हिंसक भी हुए। 

कई मामलों में पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा. हालांकि, इन प्रदर्शनों का मुख्य मुद्दा शरणार्थी नीति और अवैध प्रवास था, लेकिन माहौल ऐसा बना कि कई प्रवासी समुदायों को असुरक्षा महसूस होने लगी है। 

आयरलैंड में क्या हुआ, प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
कुछ साल पहले तक आयरलैंड को प्रवासियों के प्रति आमतौर पर एक उदार देश माना जाता था. लेकिन हाल के वर्षों में वहां भी हालात बदलने लगे हैं. डबलिन और दूसरे शहरों में मकानों की भारी कमी है. किराए आसमान छू रहे हैं. स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि बड़ी संख्या में नए लोगों के आने से दबाव और बढ़ा है. 2023 के आखिर में डबलिन में हुई हिंसा के बाद प्रवास और सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है. इसके बाद कई जगहों पर शरणार्थी केंद्रों और आवास योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले. ताजा हालात ये हैं कि शहर-शहर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। 

ताजा मामला उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में एक सूडानी शरणार्थी से जुड़ी चाकूबाजी से जुड़ा है, जिससे हालात तनावपूर्ण हो गए. घटना के विरोध में भड़की हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं. हालात को काबू में करने के लिए एंटी-राइट पुलिस, स्पेशल फोर्सेज और वॉटर कैनन की तैनाती की गई. प्रदर्शनकारियों पर ईंटें फेंकने और वाहनों में आग लगाने के आरोप हैं, जिसके बाद कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। 

स्थानीय मीडिया की मानें तो कुछ दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े उपद्रवियों ने प्रवासियों और जातीय अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए कई इलाकों में घर-घर जाकर डराने-धमकाने की कोशिश भी की. इस दौरान कुछ मकानों और कारोबारों पर हमले किए गए और प्रदर्शनकारियों ने कई संपत्तियों को नुकसान भी पहुंचाया। 

जर्मनी में प्रवासियों और शरणार्थिों पर बहस तेज
जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. यहां लाखों विदेशी काम करते हैं. भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. लेकिन जर्मनी में भी प्रवास को लेकर राजनीतिक माहौल बदल रहा है. कुछ राजनीतिक दलों का कहना है कि देश को अपनी सीमाओं और शरणार्थी व्यवस्था पर ज्यादा नियंत्रण की जरूरत है। 

दूसरी तरफ लाखों लोग ऐसे भी हैं जो प्रवासियों के समर्थन में सड़कों पर उतरते हैं. यानी जर्मनी में लड़ाई सिर्फ प्रवासियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि समाज दो अलग-अलग विचारधाराओं में बंटा हुआ नजर आ रहा है। 

नीदरलैंड और दूसरे देशों में क्या तस्वीर है?
यूरोप के अन्य देशों में भी प्रवास को लेकर बहस तेज हुई है. कहीं मुद्दा मकानों की कमी है, कहीं सुरक्षा को लेकर चिंता है, तो कहीं सरकारों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे सीमाओं को नियंत्रित नहीं कर पा रहीं. इटली लंबे समय से भूमध्य सागर के रास्ते आने वाले प्रवासियों का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है. वहीं फ्रांस में भी समय-समय पर प्रवास और राष्ट्रीय पहचान को लेकर प्रदर्शन देखे जाते हैं. यानी हर देश की अपनी कहानी है, लेकिन लगभग हर जगह कुछ समान कारण दिखाई देते हैं। 

दक्षिणी यूरोप के कई हिस्सों में इस समय बड़े पैमाने पर पर्यटन के खिलाफ भी विरोध बढ़ रहा है. नीदरलैंड, बेल्जियम, स्वीडन, फ्रांस, स्पेन और इटली के कई शहरों में भी स्थानीय लोग सड़कों पर उतरे हैं. लोगों का कहना है कि पर्यटकों की वजह से मकानों के किराए और संपत्तियों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जबकि सार्वजनिक सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ा है।  

स्पेन में बार्सिलोना और कैनरी द्वीप समूह समेत 40 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन हुए हैं. वहीं इटली के वेनिस, फ्लोरेंस, रोम और मिलान में किराये वाले पर्यटन आवासों के खिलाफ अभियान और विरोध प्रदर्शन जारी हैं. फ्रांस में मार्सेई से लेकर पेरिस तक कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने क्रूज जहाजों और अत्यधिक पर्यटक भीड़ के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं. हालांकि, ये आंदोलन खासतौर से पर्यटन और आवास संकट को लेकर हैं, लेकिन इन्होंने प्रवास, स्थानीय संसाधनों की बढ़ती लागत पर चल रही बहस को भी और तेज कर दिया है। 

आखिर यूरोप के लोग नाराज क्यों हैं?
अगर आसान भाषा में समझें तो यूरोप के कई देशों में लोगों की नाराजगी के पीछे पांच बड़े कारण हैं. पहला, मकानों की कमी, जहां कई शहरों में घर मिलना मुश्किल होता जा रहा है. दूसरा बड़ा मुद्दा बढ़ती महंगाई है. लोगों को लगता है कि संसाधन सीमित हैं और कंपटीशन बढ़ रहा है. तीसरा, शरणार्थी व्यवस्था पर दबाव बनाने की रणनीति है. सरकारों को हजारों लोगों के रहने, खाने और कानूनी प्रक्रिया का खर्च उठाना पड़ता है। 

चौथा, सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बड़ा मुद्दा है. कुछ आपराधिक घटनाओं के बाद पूरे प्रवासी समुदाय को लेकर बहस शुरू हो जाती है. पांचवां, सोशल मीडिया भी है जिसकी वजह से प्रदर्शनों को हवा मिलती है. कई बार अधूरी या गलत जानकारी बहुत तेजी से फैलती है और माहौल को और ज्यादा तनावपूर्ण हो जाता है। 

भारतीयों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
यूरोप में रहने वाले ज्यादातर भारतीय छात्र, आईटी प्रोफेशनल, डॉक्टर, इंजीनियर, रिसर्चर्स या बिजनेस करने वाले लोग हैं. वे कानूनी तरीके से वहां पहुंचे हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. फिर भी जब किसी देश में प्रवास विरोधी माहौल बनता है, तो उसका असर सभी विदेशी समुदायों पर पड़ सकता है। 

मान लीजिए किसी देश की सरकार प्रवास कम करने का फैसला करती है. ऐसे में वह सिर्फ शरणार्थियों पर ही नहीं, बल्कि स्टूडेंट वीजा, वर्क वीजा और परिवार को बुलाने के नियमों को भी सख्त कर सकती है. ब्रिटेन में पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों और उनके परिवारों को लेकर नियमों में बदलाव हुए हैं. इसका असर भारतीयों पर भी पड़ा है। 

हर साल हजारों भारतीय छात्र ब्रिटेन, आयरलैंड और यूरोप के दूसरे देशों में पढ़ने जाते हैं. लेकिन अगर राजनीतिक माहौल लगातार प्रवास विरोधी होता है, तो सरकारें विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने, पोस्ट-स्टडी वर्क परमिट के नियम बदलने या वीजा प्रक्रिया को और कड़ा करने जैसे कदम उठा सकती हैं. इसका मतलब यह नहीं कि भारतीय छात्रों के लिए दरवाजे बंद हो जाएंगे, लेकिन पहले की तुलना में रास्ता मुश्किल हो सकता है। 

नौकरी करने वाले भारतीयों पर क्या असर होगा?
भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, डॉक्टर और इंजीनियर यूरोप की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं. दिलचस्प बात यह है कि यूरोप की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है. कई देशों में कर्मचारियों की कमी है. इसलिए उन्हें विदेशी स्किल्स की जरूरत भी है. यही वजह है कि एक तरफ कुछ राजनीतिक दल प्रवास कम करने की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कंपनियां और उद्योग विदेशी कर्मचारियों को बुलाने की मांग करते हैं. यानी भारतीय प्रोफेशन्स के लिए अवसर पूरी तरह खत्म होने वाले नहीं हैं. लेकिन वीजा और इमिग्रेशन प्रक्रियाएं ज्यादा सख्त और जांच-पड़ताल वाली हो सकती हैं। 

क्या हालिया प्रदर्शनों में भारतीयों को निशाना बनाया गया?
हाल के महीनों में ब्रिटेन, आयरलैंड और दूसरे यूरोपीय देशों में हुए अधिकांश बड़े प्रदर्शनों का केंद्र बिंदु शरणार्थी नीति, अवैध प्रवास, आवास व्यवस्था और सरकार की इमिग्रेशन नीतियां रही हैं. ऐसे प्रदर्शनों में प्रवासियों के खिलाफ नाराजगी जरूर दिखाई देती है, लेकिन रिपोर्ट्स और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि हालिया बड़े विरोध प्रदर्शनों का मुख्य निशाना भारतीय समुदाय था। 

यूरोप इस समय एक मुश्किल संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. उसे एक तरफ अपनी सीमाओं और शरणार्थी व्यवस्था को संभालना है, तो दूसरी तरफ उसे विदेशी छात्रों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और कुशल कर्मचारियों की भी जरूरत है. भारतीयों के लिए सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल सीधा विरोध नहीं, बल्कि बदलती नीतियां हैं. वीजा नियम, नौकरी के अवसर, परिवार को साथ ले जाने की शर्तें और स्थायी निवास के नियम आने वाले वर्षों में ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं।